ज़द में तूफों की मेरा आसन रहा

ज़द में तूफों की मेरा आसन रहा
देखता फिर भी मेरा भगवन रहा,

बह रही थी हर तरफ खूँ की नदी
अहले-शर का जब तलक शासन रहा,

नज़रे-आतिश हुस्न फूलों का हुआ
माली से महरूम जब गुलशन रहा,

बह रहा था जब अहिंसा का लहू
सर उठाये वक्त का रावन रहा,

सबका सूरज दे रहा था रोशनी
मेरे सूरज में लगा गरहन रहा,

आशियाँ जब, बन रहा था उस घड़ी
बर्क का ख़दशा सरे गुलशन रहा,

कारवाँ लूटा मेरा जिसने ‘उमेश’
भेष में रहबर के वो रहज़न रहा।