अपने ही हाथों अपनी ही, दुनिया तबाह की

अपने ही हाथों अपनी ही, दुनिया तबाह की
मुझसे हुई ये भूल तुम्हारी जो चाह की,

अल्लाह सबका एक है और नाम अलग-अलग
मानी जो ओम की है वही लाइल्लाह की,

गुज़रे चमन की राह से जब वो बवक्ते शाम
सुम्बुल ने तरज़ुमानिए-जुल्फे सियाह की,

हर दौर हर ज़माने में इसराहे-इश्क में
देखी है हमने झुकते जबीं बादशाह की,

झूठी गवाही देना अदालत में ऐ “उमेश’
ले ले कहीं न जान किसी बेगुनाह की।