इस क़दर तारी हुई है ज़िन्दगी

इस क़दर तारी हुई है ज़िन्दगी
जान पर भारी हुई है ज़िन्दगी,

आज तक जिसका नहीं कोई ईलाज
ऐसी बीमारी हुई है ज़िन्दगी,

खोखले शब्दों का सम्मोहन है सब
वो अदाकारी हुई है ज़िन्दगी,

बेचती है ख्वाब फिर ताबीरे-ख्वाब
खूब व्यापारी हुई है ज़िन्दगी,

कोई हिस्सा कोई उजरत कुछ नहीं
एक बेगारी हुई है ज़िन्दगी,

सबसे पर्दा सबसे तिकड़म है ‘उमेश’
चोर-बाज़ारी हुई है ज़िन्दगी,

जी सके वर्मा न तो हम मर सके
कि एक लाचारी हुई है ज़िन्दगी।

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