तहरीर तेरी क़ातिबे-तकदीर देखकर

तहरीर तेरी क़ातिबे-तकदीर देखकर
हैरान हूँ मैं खवाब की ताबीर देखकर,

बस में नज़र है और न क़ाबू में दिल मेरा
तेरे खुलूस-वो प्यार की जागीर देखकर,

शरमा के चाँद छप गया अबन्ने-स्याह में
हुस्नो-जमाल की तेरे तनवीर देखकर,

हम जानते हैं ज़ुल्म से टकराने का हुनर
डरते नहीं इसीलिए शमसीर देखकर,

गुलशन में सर पटकती है अपना बहारे-नव
लिपटी ग़मों की पाँव से ज़न्जीर देखकर,

डूबा हुआ हे सोग में सारा जहाँ ‘उमेश’
बिगड़ी हुई ये सूरते-कश्मीर देखकर।

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