यूँ न अल्फाज को मिस्ले-तूफान कर

यूँ न अल्फाज को मिस्ले-तूफान कर
तू हकीकत बयाँ पहले नादान कर,

मुझसे समझौता गर चाहता हे कि हो
अपनी शर्तों को कुछ ओर आसान कर,

ज़ख्म मुरझा गया है जो कर दे हरा
इस दिल-ए-नातवाँ पर ये एहसान कर,

मैं अमानत किसी ओर की हूँ मुझे
याद करके न खुद को परीशान कर,

बागवाँ तुझको मासूम गुल की कसम
गुलशने-हिन्द को यूँ न वीरान कर,

दौलते-इल्म दी है जिन्होंने तुझे
ऐ “उमेश’ उन बुज़ुर्गों का सम्मान कर।

 64 total views,  2 views today