हुकुमत मुल्क को लगता है रूसवा करके छोडेगी

हुकुमत मुल्क को लगता है रूसवा करके छोडेगी
न होगा तन पे कपड़ा, जिस्म नंगा करके छोड़ेगी,

अमल उपदेश पे गाँधी के, कोई भी नहीं करता
सियासत आज की गुलशन को, सहरा करके छोड़ेगी,

हवा रोकी न जायेगी, अगर फिरका परस्ती को
जो ज़िंदादिल हैं उनको भी ये मुर्दा करके छोड़ेगी,

अगर दीवार नफरत की गिराओगे न आँगन से
अखुव्वत का यकीनन, चूर शीशा करके छोड़ेगी,

तमन्ना सुबह-ए-नौ की है तो पैदा अज़्मे-मोहकम कर
नहीं तो हक बयानी तुझको गूँगा करके छोड़ेगी,

सँभलकर पाँव रक्‍्खो, है हुकुमत बेज़मीरों की
वगर्ना ये कयामत तुमको अंधा करके छोडेगी,

सहारा ‘ऐ’ उमेश इसको अगर मिलता रहा हूँ ही
एक-न एक दिन तुमको तन्‍्हा करके छोड़ेगी।

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