इनकार बिक गया, कभी इकरार बिक गया

इनकार बिक गया, कभी इकरार बिक गया
जिस पर मुझे था नाज़, वही प्यार बिक गया,

हालात का शिकार हरेक शख्स हे यहाँ
किसने कहा कबीले-का सरदार बिक गया,

इस बात का सबूत मिलेगा न आपको
दोलत के वास्ते कोई नादार बिक गया,

क्या जाने हश्र क्या हो, हमारे महाज़ का
दुश्मन के हाथ साहिबे-तलवार बिक गया,

अफलासो- भूख-वो प्यास की ज़द से निकल गये
अच्छा हुआ कि आपका अखबार बिक गया,

क्या जाने किस तरह के खरीदार आये थे
जो माल ले के आया था बेकार बिक गया,

गुजरात में कुछ ऐसी लगी नफरतों की आग
भाई का प्यार, बहनों का सिंगार बिक गया,

जल जाता ये भी फिरकापरस्ती की आग में
अच्छा हुआ कि पहले ही घर बार बिक गया,

हालात चाहे जैसे रहे हों मगर ‘उमेश’
ऐसा नहीं कि साहिब-ए-किरदार बिक गया।