यहाँ पर खयालों का इज़हार मत कर

यहाँ पर खयालों का इज़हार मत कर
चमन के उसूलों से तू प्यार मत कर,

नदी इक लहू की यहाँ बह रही है
खुदा के लिये तू इसे पार मत कर,

ये है शहर अंधों का, ऐ मेरे हमदम
तू पत्थर की मूरत से इसरार मत कर,

मेरे भाई जो चाहिए तुझको ले ले
खड़ी लेकिन आँगन में दीवार मत कर,

खफ़ा तुझसे हो जायेगा तेरा साया
बुलन्द इस कदर अपना मेयार मत कर,

जिन्हें आदमी के लहू की हो चाहत
तू उन देवताओं का दीदार मत कर,

ये आँसू ‘उमेश’ एक दिन काम देंगे
मेरी बात सुन इनको बेकार मत कर।

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